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लंगर सेवा के साथ अब रमनप्रीत कौर घर बैठे ही बुजुर्गों का मनोबल बढ़ा रही है व मोरपंखी कविता – कौशल्या अग्रवाल कौशल


 
मोरपंखी कविता
मेरे आंगन में ,
एक  बड़ा पेड़ लगा था,
अगली मंजिल तक जो चढ़ा था,
सब उसे मोरपंखी कहते थे। मैंने देखा,कभी उसपर
गौरैया अपना बसेरा किये रहती,और कभी तोता मैना,
और कभी कौआ ,
और भी न जाने कितने पक्षी, उसकी पतली नालूम सी पत्तियों वाली सुंदर शाखाओं  की शीतल छांव में आकर चहकते मचलते
और दिनभर की थकान दूर कर, न जाने कहां सोने चले जाते।
मैंने देखा,
वहां उसपर एक घोंसला भी था,फुदक फुदक कर जहां चिड़िया आती ,चीं चीं कर अपने बच्चों को दाना खिला फिर धीरे धीरे उन्हें उड़ना सिखाती।
उस पेड़ की ख़ूबसूरत डालियां भी उनके साथ हिलमिल कर किल्लोल करती।
संभवतः  वे एक दूसरे की भाषा समझते थे,
तभी तो भिन्न प्रकृति , भिन्न रूप, भिन्न रंग और जाति के होते हुये भी यों
परस्पर मिल विहार करते। मैंने देखा मोरपंखी ने भी कभी उन्हें बोझ नहीं माना। अन्यथा उसपर भी कभी तनाव के निशान होते। जबकि उसपर तो मैंने कभी फल भी नहीं लगते देखे।
मैंने देखा पक्षी फिर भी वहां आते और प्रेमलाप करते।
मैंने देखा, मेरी नन्हीं सी बिटिया भी हरियाली से भरी गुच्छों वाली उसकी सुंदर छोटी छोटी पंखुड़ियां तोड़ कर अपनी हर पुस्तक में संवार कर रखती,
यह सोचकर कि
यह मोरपंखी मानों उसके लिए विद्या और ज्ञान का भंडार है।
और तो और मैं भी
उसकी नन्हें पत्तों वाली हरे मोतियों से भरी टहनियों को फूलदान में सजाकर अपने कार्निश की शोभा में चार चांद लगाया करती ,
और हम सब भी उसकी छांव में चारपाई डाल शीतल पवन का आंनद लिया करते।
मैंने देखा, मोरपंखी की प्रकृति में कभी कोई अंतर नहीं आया। उसने सदैव सब पर समान स्नेह था बरसाया, जबकि उसने कभी किसी से विशेष जल भी नहीं मांगा,
मेघ ने प्रेम से जो दे दिया,
उसी को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
किन्तु एक दिन मेरी बिटिया रोती हुईं मेरे पास आई
और बोली कि मां आज मकान मालिक को जाने क्या हुआ कि उसने अपने एक दफ्तर के अदर्ली के हाथ में कुल्हाड़ी दे वह प्यारा सा पेड़ कटवा दिया।
मानों मोरपंखी से कोई भारी था अपराध हो गया ,
यह सुन दिल मेरा भी भर आया,
मानों कोई प्रिय बिछुड़ गया। उसकी टूटी शाखाओं से लिपट लिपट उस दिन नन्हीं बहुत रोई और उदास हो गई, मानों उसकी कोई प्यारी सहेली बिछड़ गई।
पक्षी अब भी वहां आते हैं।पंख फड़फड़ाते आशियाना अपना तलाशते हैं, किन्तु शून्य पा निराश हो दूर कहीं उड़ जाते हैं।
और मेरी वह चारपाई भी कलतक जो  मेरी विश्राम स्थली थी मोरपंखी की छत की छांह को न  पा ठूंठ हो एक कोने में खड़ी हो गई,
और हम सब भी ठंडी छांह के लिए कमरों के भीतर कैद हो गये हैं।
रचनाकार कौशल्या अग्रवाल कौशल देहरादून उत्तराखंड – रमनप्रीत जी, आपने मुझसे एक रिकार्डेड कविता का आग्रह किया था पिछले माह की सदीनामा की गोष्ठी पाठ में मैंने अपनी मोरपंखी नामक रचना का वाचन किया था रचना अड़तीस साल पुरानी है और उसी पुराने घर की है जिसमें तुम आई थी सत्य कथा पर लिखी गई है सुनकर विचार जानने की जिज्ञासा रहेंगी इसके बाद मेरी कोशिश होगी कुछ छोटी-छोटी कविताएं रिकार्ड करके शाने उत्तराखंड में प्रेषित कर सकूं
लंगर सेवा के साथ अब रमनप्रीत कौर घर बैठे ही बुजुर्गों का बढ़ा रही है मनोबल – करोना महामारी के समय में रमनप्रीत द्वारा सीनियर सिटीजन को मोटिवेट करने के लिए मनवीर कौर चैरिटेबल ट्रस्ट का कौशल्या अग्रवाल कौशल बहुत-बहुत धन्यवाद करती है

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