
हमारी ज़िंदगी खूबसूरत है.. और हम अगर थोड़ी सी सावधानियां बरतें, तर्क और धैर्य से काम लें को हम इसे और बेहतर और खूबसूरत बना सकते हैं। हम सभी कभी न कभी बचपन से गुजरे होते हैं, और अनुभव करते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ साथ हमारे सोचने और काम करने के तरीके में बदलाव आता जाता है। लेकिन जब हम अपने छोटे बच्चों के साथ व्यव्हार करते हैं तो भूल जाते हैं कि हम तो उस उम्र से गुजर चुके हैं, लेकिन वो अभी हमारी उम्र में नहीं पहुंचा है। हम अपने ज्ञान और अनुभव को उसके ऊपर मानते हैं, यह सही भी है, लेकिन हमें उसकी उम्र और उसकी सोच का भी खयाल रखना चाहिए। अधिकांश परिवारों में ये समस्या देखी जाती है जहां माता-पिता बच्चों को कंट्रोल करने के लिए उनपर पर अपनी इच्छाओं को थोपते हैं.. जिसका खामियाज़ा हमे तुरंत नहीं.. लेकिन धीरे-धीरे बाद में पता चलता है..
हम जानते हैं कि हर शख्स के सोचने समझने का तरीका, पसंद-नापसंद और आदतें अलग-अलग होती हैं, फिर वो 3-4 साल का बच्चा हो या वयस्क। बच्चों को खिलौनों से ज्यादा लगाव होता है और आकर्षण भी। बाहर जाने पर अक्सर बच्चे खिलौनों की मांग करते हैं, बच्चे को प्लास्टिक का छोटा सा खिलौना अच्छा लगता है तो हम घटिया या सस्ता कह कर समझा देते हैं कि तुम्हारे काम का नहीं है, लेकिन ये नहीं सोचते कि खिलौनों से जिंदगी भर कोई बच्चा नहीं खेलता। खिलौने तो टूटते रहते हैं, बच्चों की पसंद बदलती रहती है। फिर छोटे से खिलौने के लिए बच्चे पर अपनी पसंद क्यों थोपना? आपने अगर खिलौने की मजबूती को परख भी लिया और फिर भी वो आपको पसंद नहीं आया, तो कम से कम उसके रंग और आकार में तो बच्चे की पसंद को अहमियत दीजिए। ऐसे न जाने कितने ही उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं, बच्चों के स्कूल बैग में भी बच्चों की पसंद को महत्व नहीं दिया जाता। हम बच्चों को सही वजह बताए बिना आदेश सुना देते हैं कि तुम्हें यही बैग लेना पड़ेगा, भले ही उसका रंग या डिजाइन बच्चे को नापसंद हो।
अगर हम इस समस्या के कारण की तलाश करें तो पाते हैं कि हम कोई भी निर्णय बच्चों पर थोपने से पहले ये नहीं सोचते कि हम भी उस दौर से गुजर चुके होते हैं। हमे भी उस उम्र में क्या पसंद और नापसंद होता था, उसका ध्यान नहीं करते। कुछ आदतें तो हमे अपने परिवार और आसपास से विरासत में मिली होती हैं। अगर हमारे माता-पिता ने भी हमे इसी बंदिश में पाला है तो हम भी उसी तरह अपने बच्चे को पालने लगते हैं। हम नहीं समझते कि हमारे समय के बच्चों और अब के बच्चों की सोच में कितना अंतर आ चुका है। हमे जिस चीज का ज्ञान कक्षा 8 तक नहीं होता था, अब वो जानकारी कक्षा 3 के बच्चों को मालूम होती है। अब के बच्चों की सोच में बदलाव आ चुका है, वो तार्किक हो रहे हैं और हमारी बातों को समझने की क्षमता भी रखते हैं।
जरूरी नहीं है कि आपका बच्चा जीवन में वही करे, जो आपने किया। आजकल के बच्चे यूट्यूब पर गैमर हो रहे हैं, जिसके बारे में शायद कभी आपने सोचा भी नहीं होगा. जब हम बच्चों पर अपनी पसंद और नापसंद थोपते रहते हैं, तब हमें ये एहसास नहीं होता कि हम उनके व्यक्तित्व में बाधक बन रहे हैं। हमारे इस व्यवहार के कारण बच्चे के मन में ये सोच बन जाती है कि उसका कोई भी निर्णय सही नहीं होता है, जो माता-पिता सोचते हैं वही उसके लिए बेहतर होता है। ऐसे में बच्चे के अंदर निर्णय लेने की क्षमता का विकास नहीं हो पाता और बड़े होने पर भी वो हर छोटे-बड़े फैसलों के लिए बड़ों का मुंह ही देखता है। और जब वयस्क होने पर वो अपनी नौकरी या व्यवसाय में लगता है, तो उनमें निर्णय न ले पाने के कारण नेतृत्व करने का गुण पैदा नहीं हो पाता और वो अपने साथियों से करियर में पीछे होता देखा जा सकता है।

आइये इस समस्या के उपायों पर नज़र डालते हैं
अपने व्यवहार पर चिंतन करें– अपने पालन-पोषण की शैली पर विचार करने के लिए कुछ समय निकालें और विचार करें कि जिस चीज के लिए आप नियंत्रण कर रहे हैं, क्या वहां इसकी जरूरत है। साथ ही ये भी मान लें कि नियंत्रण करना आपके बच्चों के विकास और संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
अंतर्निहित कारणों को समझें- अपने इस तरह के कंट्रोलिंग व्यवहार के पीछे के कारणों को समझने का प्रयास करें। क्या यह आपके अपने डर, असुरक्षा या अपने बच्चों की सफलता की इच्छा से उपजा हो सकता है। इन कारणों को पहचानने से आपको उन्हें अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करने में मदद मिल सकती है।
खुलकर बात करें- अपने बच्चों के साथ खुले और ईमानदारी से बातचीत करें। निर्णय या आलोचना के डर के बिना अपने विचारों, भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने के लिए उनके लिए एक सुरक्षित स्थान बनाएँ। उनके दृष्टिकोण को महत्व देते हुए सक्रिय रूप से और सहानुभूतिपूर्वक सुनें।
सीमाएं स्थापित करें- मार्गदर्शन प्रदान करना और अपने बच्चों के लिए सीमाएं निर्धारित करना महत्वपूर्ण है, सुनिश्चित करें कि ये सीमाएं ठीक है और उनकी उम्र के हिसाब से उपयुक्त हैं। अपने बच्चों को अपनी रुचियां तलाशने दें, गलतियां करने दें और उन गलतियों से उन्हें सीखने दें। जरूरत पड़ने पर मार्गदर्शन दें, लेकिन उनकी स्वायत्तता का भी सम्मान करें।
अपने बच्चे पर विश्वास करें- माता-पिता और बच्चे के रिश्ते को बढ़ावा देने के लिए विश्वास बेहद महत्वपूर्ण होता है। अपने बच्चों की क्षमताओं और निर्णयों पर विश्वास दिखाएं, उन्हें जिम्मेदारियां लेने और अपनी पसंद बनाने के अवसर दें,
स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करें- स्वतंत्रता और निर्णय लेने के कौशल विकसित करने में अपने बच्चों का समर्थन करें। उन्हें उनकी उम्र के मुतबिक ज़िम्मेदारियाँ लेने दें, जैसे कि घर का काम या अपने स्कूल के लिए टाइम टेबल के हिसाब से किताबें बैग में रखना, और अगर वो अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभाते हैं तो उन्हें धीरे-धीरे उन्हें अधिक स्वतंत्रता दें।
रोल मॉडल बनें- बच्चों के सामने वह व्यवहार करें जो आप अपने बच्चों में देखना चाहते हैं। उन्हें सम्मान, दया और खुले विचारों वाला दिखाएं, क्योंकि वे आपके व्यवहार का अनुकरण करने की संभावना रखते हैं।
जरूरत पड़ने पर परामर्श लें- यदि आपको अपने नियंत्रण की आदत को खुद से बदल पाना चुनौतीपूर्ण लगता है, तो किसी चिकित्सक या परामर्शदाता से मदद लेने पर विचार करें वे आपकी विशिष्ट स्थिति के अनुरूप मार्गदर्शन और सहायता प्रदान कर सकते हैं।
याद रखें, बदलाव में समय और मेहनत लगती है। अपने और अपने बच्चों के साथ धैर्य रखें क्योंकि आप पेरेंटिंग शैली को अधिक पोषण और सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
माया मिश्रा, काउंसलिंग साइकॉलोजिस्ट, पेरेंटिंग कोच

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