
“धूप का जंगल, नंगे पाँव, इक बंजारा करता क्या?
रेत का दरिया ,रेत के झरने, प्यास का मारा करता क्या?
बादल बादल आग लगी थी छाया तरसे छाया को,
पत्ता पत्ता सूख चुका था , पेड़ बेचारा करता क्या?”
पूरे सौरमंडल में केवल पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन संभव है। इसका कारण यहां का पर्यावरण है। अनादि काल से मानव का अस्तित्व वनस्पति और जीव जंतुओं पर निर्भर रहा है। जीवन और पर्यावरण एक दूसरे से संबद्ध हैं। अतः हमारे तन मन की रचना ,शक्ति, सामर्थ्य एवं विशेषताएं पर्यावरण से नियंत्रित होती हैं, पनपती हैं और विकास पाती हैं। वस्तुत जीवन और पर्यावरण एक दूसरे से इतने जुड़े हुए हैं कि दोनों का अस्तित्व बहुत आवश्यक है।
हम सभी जानते हैं कि धरती पर जीवन प्राकृतिक संतुलन से संभव हो सका है। पृथ्वी वनस्पतियों से ढक ना जाए, इसलिए घास खाने वाले जानवर पर्याप्त मात्रा में थे। घास खाने वाले जानवरों की संख्या को संतुलित, सीमित रखने के लिए हिंसक जंतु भी थे। इन तीनों का अनुपात संतुलित एवं नियंत्रित था।
किंतु समय के साथ पर्यावरण का संतुलन तेजी से बिगड़ता जा रहा है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों का अविवेकपूर्ण ढंग से दुरुपयोग कर रहा है जिससे सारा प्राकृतिक तंत्र असंतुलित हो गया है।इस असंतुलन से भूमि ,वायु ,जल ,ध्वनि और मृदा के प्रदूषण उत्पन्न हो रहे हैं ।आधुनिक युग में वैज्ञानिक आविष्कार और उद्योग धंधों के विकास, फैलाव के साथ-साथ जनसंख्या का भयावह विस्फोट हुआ है ।इन सभी कारकों ने पर्यावरण असंतुलन को जन्म दिया है। गांधी जी ने कहा भी है कि “प्रकृति हमारी जरूरतें पूरा कर सकती है, लालच नहीं”। प्रति वर्ष पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहन देने के लिए वैश्विक स्तर पर 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। भारत ने हाल ही में पर्यावरण के लिए जीवन शैली अर्थात् लाइव फॉर एनवायरमेंट आंदोलन की शुरुआत की है।
मनुष्य जिस तेजी से विकास कर रहा है उतनी ही तेजी से पर्यावरण को प्रदूषित भी कर रहा है ।हमारे पर्यावरण में पाए जाने वाले सभी जैविक तथा अजैविक घटकों का अंधाधुंध उपयोग किया गया है जिसकी वजह से पर्यावरण प्रदूषण उत्पन्न हुआ है।
हमारी आवश्यकताएं असीमित हैं तथा प्राकृतिक संसाधन सीमित। प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग इसे धारणीय बनाने के लिए आवश्यक है। पर्यावरण के संरक्षण का अर्थ है कि वर्तमान पीढ़ी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति आने वाली पीढ़ी की आवश्यकताओं से बिना समझौता किए कर सके। पर्यावरण संरक्षण के मुख्य उद्देश्य होने चाहिए-
जैव विविधता को बनाए रखा जाए।
वनों का संरक्षण किया जाए।
वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाए।
समाज के हर स्तर पर पर्यावरण संबंधी जागरूकता को बढ़ावा दिया जाए।
ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाई जाए।
सभी स्तर की शिक्षा में पर्यावरण की शिक्षा को अनिवार्य विषय बनाया जाए।
व्यापक शिक्षा तथा पर्यावरण जागरूकता के कार्यक्रम में निवेश के द्वारा निजी क्षेत्र की सहभागिता सुनिश्चित की जाय।
सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थानों की मदद से लोगों को पर्यावरण संबंधी मुद्दों के बारे में शिक्षित किया जाए।
” वृक्ष धरा के भूषण हैं
करते दूर प्रदूषण हैं।”
नेहा खरे स्नेहा
PLZ Subscribe RN TODAY NEWS CHANNEL https://www.youtube. com/channel/UC8AN- OqNY6A2VsZckF61m-g न्यूज़ या आर्टिकल व विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें (RN TODAY NEWS +919927141966) https://www. youtube.com/channel/ UCFS7PmVqRXSD_4CQXaYvx0A PLZ Subscribe
RN TODAY Online News Portal