
प्रेम को प्रेम की नज़र से देखा जाए तो वो प्रेम होगा। यदी वासना की भावना से देखा जाए जो सिर्फ कामांग को खाने की लालसा तो वहां घृणा पैदा होगी, और जहां घृणा हो वहां विनाश संभव है। प्रेम एक नए सुंदर समाज को निर्मित करेगा, जबकी वासना एक नफरती भीड़ ही पैदा कर सकती है।
स्त्री उस नदी के समान है। जो पहली नज़र में एकदम शांत, सुंदर, निश्चल प्रतीत होती है। उसे जहां रास्ता मिले चल देती है। उसके बहने की कल कल आवाज़ चित्त को प्रसन्नता प्रदान करती है। स्वतंत्र होती है इसीलिए हंसमुख होती है। इसीलिए उसे पूजा जाता है। देवी माना जाता है। उसके इसी स्वभाव की वजह से एक प्रेम का जन्म होता है। एक नई किरण का जन्म होता है।
लेकीन जब किसी नदी के ऊपर बांध बना दिया जाता है। तब उसकी शांति भंग हो जाती है। उसका स्वभाव तो स्वतंत्रता का था। लेकीन आपने उसे कैद कर दिया। अब उसकी धाराएं क्या करेंगी। विरोध के अलावा उनके पास चारा ही क्या है। उसकी मासूमियत को अब विकराल रूप धारण करने से कोई नहीं रोक सकता। अब वह सिर्फ विनाश के रास्ते से ही होकर गुजरेगी।
आज का समाज भी उसी रास्ते पर चल रहा है। प्रेम करने वाली स्त्री के ऊपर बांध बना दिया है। अब वह बांध वासना का जन्म हुआ। दमन का बांध हो , जिससे विरोधभास का जन्म हुआ।
शिखा.. 



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