
पीरियड्स महावारी रजस्वला,
आखिर क्या है ये बला..!
तुम जो अपनी मर्दानगी पर इतना इतराते हो
दरअसल बाप तुम इसी क्रिया से बन पाते हो
कुछ मर्दो को नही है फिर भी तमीज़
उनके लिए है बस ये उपहास की चीज
हम 21वी सदी में जी रहे है
चाँद को छू कर उसका नूर पी रहे है
पर् व्हिस्पर आज भी काली पैकेट में दिया जाता है
जैसे हमे कोई छूट की बीमारी ऐसे सबसे अलग कर दिया जाता है
चुपचाप दर्द पीना भी सीखा देते है
किसी को पता न चले घर मे ये भी समझा देते है
भाई पूछता है पूजा क्यों नही की
तो सर छुका कर उसको समझाना पड़ता है
चाहे दर्द में रोती रहे
पर पापा को देख कर मुस्कुराना पड़ता है
पेट के निचले हिस्से को जैसे कोई निचोड़ देता है
कमर और जांघ की हड्डियां जैसे कोई तोड़ देता है
खून की रिसती बूंद के साथ तड़पती है वो
और जिसे तुमने नाम दे दिया “क्रेम्पस” का
उसमे सोफे पर निढाल होकर सिसकती है वो
अब तुम पुरुष कहोगे
इसमें हमारी क्या गलती
हमारा क्या दोष है
तो सुनो तुमसे हमारी
न कोई शिकायत न कोई रोष है
बस जब तड़पे दर्द से
तो “मैं हूं ना” ये एहसास करवा देना
गर्म पानी की बोतल लाकर
तुम दर्द मिटा देना
जो लगे चाय की तलब
तो एक कप चाय बना देना
पैड खत्म हो जाए तो
बिना झुंझलाए ला देना
“तो मैं क्या करू?” कह कर
मुँह मोड़ कर जाना मत
“रेड अलर्ट” “लाल बत्ती”
जैसे शब्दो से चिढ़ाना मत
बालो में तेल लगा कर
पीठ को सहला कर
बस जरा सा प्यार जता देना
हम तो धर्म निभाते है
महीने के 27 दिन
तुम सिर्फ 3 दिन ही निभा देना…!
शिखा.. 

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