
बेशर्म रात को आज,
और बेशर्म होने दे,
धीरे – धीरे से अपने,
सुर्ख बदन में खोने दे।
प्यास बुझती नहीं अब,
तेरी नशीली आँखों से,
अधरों का शुक्रिया हो,
जो चख लूँ इन्हे बातों से।
अधरों ने दे दी इजाजत ,
अब है बाहों की बारी,
इनमे ड्रबने को सच,
सारी है रात हमारी ।
प्यासे लबों में तेरी
नशा बड़ा नशीला,
बाहों की गर्मियों से
रोम – रोम हुआ गीला।…
जिधर ये हाथ फिसले
उधर ही मैं खो जाऊँ,
तेरे बदन की नक्काशी,
को कैसे भला भुलाऊँ ?
वासना की अग्नि.
अब और तेज भड़के,
तेरे बदन में खोने को,
ये दिल और तड़पे …
बेशर्म रात अभी बाकी ,
मत इससे तुम घबराना,
बेशर्मी की आज सारी ,
हदे पार कर जाना।
तेरा नग्न बदन आज,
बस मेरे लिए थकेगा,
बेशर्म रात की यादों को,
जीवन भर याद रखेगा ।…
शिखा.. 



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