
“नारी के रूप की तुलना प्रकृति से क्यों की जाती है..
“जुल्फों” को सावन के बादलों से-
“आंखों” को नीली झील से-
“भौंहें” को इंद्रधनुष से-
“पलकों” को चिलमन से-
“होठों” को गुलाब से-
“गालों” को सेब से “गर्दन” को सुराही से
“स्तनों” को फलों से-
“बाहों” को मुलायम डालियों से..
“रंग को धूप से-
कभी चांदी से और कभी ताजमहल के संगमरमर से…
“दांतों को अनार के दानों से
“नाभि” को कमल से..
“पिंडलियों” को मुलायम तकिए से…
“जांघों” को मखमल से…” पैरों” को कमल से…
और संपूर्ण रूप सौंदर्य को कभी परी से..
कभी अप्सरा से.. कभी ताजमहल से..
“चेहरे को पूनम के चांद से
और यौवन को महकते ताजा गुलाब से…” कवि करते हैं अक्सर तुलना स्त्री के अंग अंग की…
“यौवन के रूप निखार की…
“शमा” और “पतंगे” का अभिसार कराते हैं…
“पुष्प और भंवरे का प्यार कराते हैं…
“कवि न जाने क्या-क्या कल्पना करते हैं…
“स्त्री को कविता की सुंदरता में रचते हैं..
“सौंदर्य को शबाब में- नशा को शराब में…डाला जाता है…
“पर कवि आंखों में सुरूर का दम भरते हैं…
“अंग अंग को हीरा मोती में पिरोते हैं…
“कवि सौंदर्य की न जाने क्या-क्या कल्पना करते हैं…
“किस-किस से कितनी बार तुलना करते हैं….
ठाकुर राजवीर सिंह.. 



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